निर्मल पुर्जा, जिन्हें पूरी दुनिया प्यार से निम्सदाई कहती थी, केवल एक महान पर्वतारोही नहीं थे। वे साहस, धैर्य, आत्मविश्वास और इंसानी हौसले की असीम ताकत का प्रतीक थे। उनकी उपलब्धियों ने लाखों लोगों को प्रेरित किया और पूरी दुनिया को नेपाली पर्वतारोहियों को देखने का नजरिया बदलने पर मजबूर कर दिया।
25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले के दाना गांव में जन्मे निर्मल का पालन-पोषण मुख्य रूप से चितवन में हुआ। उनका परिवार सैन्य परंपरा वाला था। उनके पिता और तीनों बड़े भाई ब्रिटिश गोरखा रेजिमेंट में थे। बचपन से ही उनका सपना भी एक गोरखा सैनिक बनने का था।
उन्होंने छह वर्षों तक ब्रिटिश गोरखा के रूप में सेवा दी। इसके बाद वे इतिहास रचते हुए ब्रिटिश रॉयल नेवी की सबसे प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्स स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में चुने जाने वाले पहले नेपाली बने। लगभग 16 वर्षों की सैन्य सेवा के दौरान उन्होंने ऊंचे पहाड़ों और अत्यधिक ठंड वाले इलाकों में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनकी सेवाओं और पर्वतारोहण में योगदान के लिए वर्ष 2018 में उन्हें MBE (Member of the Order of the British Empire) सम्मान से नवाजा गया।
लेकिन उनके सपने इससे भी बड़े थे।
उन्होंने SBS की नौकरी छोड़ दी, अपनी सैन्य पेंशन त्याग दी और अपने यूनाइटेड किंगडम स्थित घर तक को बेच दिया ताकि वे उस अभियान को पूरा कर सकें जिसे दुनिया लगभग असंभव मानती थी।
साल 2019 में अपने Project Possible के तहत उन्होंने दुनिया के सभी 14 आठ-हजार मीटर से ऊंचे पर्वत केवल 6 महीने और 6 दिन में फतह कर लिए। इससे पहले यह रिकॉर्ड सात साल से भी अधिक का था। इस उपलब्धि ने पूरी दुनिया को चौंका दिया और बाद में नेटफ्लिक्स की प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री “14 Peaks: Nothing Is Impossible” के जरिए करोड़ों लोगों तक उनकी कहानी पहुंची।
इसके बाद भी उन्होंने कई नए इतिहास रचे।
वे केवल 48 घंटे के भीतर एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू की चोटियों पर पहुंचने वाले दुनिया के पहले पर्वतारोही बने।
साल 2021 में उन्होंने नौ अन्य नेपाली पर्वतारोहियों के साथ मिलकर दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची और सबसे कठिन चोटियों में से एक K2 पर पहली सफल शीतकालीन चढ़ाई कर इतिहास रच दिया। दशकों तक कोई भी अभियान सर्दियों में K2 को नहीं जीत पाया था, लेकिन एक पूरी तरह नेपाली टीम ने यह असंभव कर दिखाया।
वर्ष 2025 तक निर्मल 8,000 मीटर से ऊंचे पर्वतों पर 50 सफल शिखर आरोहण पूरे कर चुके थे, जो अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड था। उन्होंने बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के सबसे अधिक 8,000 मीटर चोटियों पर सफल चढ़ाई का रिकॉर्ड भी बनाया और ऊंची 8,000 मीटर चोटियों को दो बार सबसे तेज़ी से पूरा करने के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी अपने नाम किया।
लेकिन निम्सदाई की पहचान केवल रिकॉर्ड नहीं थे। उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी इंसानियत थी। उन्होंने कई बार रिकॉर्ड बनाने से पहले इंसानी जान बचाने को चुना।
अप्रैल 2019 में अन्नपूर्णा से लौटते समय उन्होंने अपनी चढ़ाई छोड़कर लगभग 40 घंटे से बिना भोजन, पानी और ऑक्सीजन के फंसे मलेशियाई पर्वतारोही चिन वुई किन की जान बचाई। उन्होंने उन्हें अपने कंधों पर उठाकर सुरक्षित नीचे पहुंचाया।
कंचनजंघा अभियान के दौरान भी उन्होंने अपनी चोटी की कोशिश छोड़कर 8,450 मीटर की ऊंचाई पर फंसे पर्वतारोहियों को बचाने के लिए अपनी ऑक्सीजन तक दे दी।
यही वह पल थे जिन्होंने साबित किया कि उनके लिए किसी भी शिखर से अधिक कीमती इंसानी जीवन था।
अक्टूबर 2019 में जब वे Project Possible पूरा कर काठमांडू लौटे तो हजारों लोग त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने पहुंचे। उनके गले में इतनी मालाएं थीं कि वे गर्दन तक ठीक से नहीं घुमा पा रहे थे। नेपाल ने अपने नए राष्ट्रीय नायक का स्वागत किया था।
लेकिन निम्सदाई केवल अपने लिए नहीं चढ़ते थे।
वे नेपाल के लिए चढ़ते थे।
वे उन सभी शेरपाओं के लिए चढ़ते थे जिनके योगदान को दुनिया अक्सर नजरअंदाज कर देती थी। उन्होंने साबित किया कि नेपाली पर्वतारोही केवल अभियानों की रीढ़ नहीं, बल्कि महान नेता और इतिहास रचने वाले नायक भी हैं।
उनके निधन पर दुनिया भर से श्रद्धांजलियां आईं।
बेयर ग्रिल्स ने कहा,
“दुनिया भर के पर्वतारोहियों के लिए यह दिल तोड़ देने वाली खबर है। तुम्हारा अटूट जज़्बा हमेशा याद रहेगा।”
महान पर्वतारोही राइनहोल्ड मेसनर ने कहा, “निम्स ने हमेशा अपना रास्ता खुद चुना। उनके जाने का दुख रहेगा, लेकिन उससे भी ज्यादा एक शानदार जीवन की याद हमेशा जिंदा रहेगी।”
Guinness World Records के एडिटर-इन-चीफ क्रेग ग्लेंडाय ने कहा, “निम्स ने बार-बार साबित किया कि इंसानी शरीर की सीमाएं हमारी सोच से कहीं आगे हैं। शेरपाओं के योगदान को दुनिया के सामने लाने का उनका प्रयास हमेशा याद रखा जाएगा।”
प्रसिद्ध नेपाली पर्वतारोही पूर्णिमा श्रेष्ठ ने कहा,
“निम्सदाई ने केवल पर्वतारोहण का इतिहास नहीं बदला, बल्कि पूरी दुनिया की सोच बदल दी। उन्होंने साबित किया कि नेपाली पर्वतारोही सिर्फ सहायक नहीं, बल्कि दुनिया के महानतम पर्वतारोहियों में शामिल हैं।”
फिल्म निर्माता और नेशनल जियोग्राफिक फोटोग्राफर जिमी चिन ने भी उन्हें मानव क्षमता की सीमाओं को लगातार आगे बढ़ाने वाला पर्वतारोही बताया। नेपाल के प्रधानमंत्री, गगन थापा, बालेन शाह और कई अन्य नेताओं ने उन्हें नेपाल का राष्ट्रीय नायक बताते हुए श्रद्धांजलि दी।
ब्रॉड पीक अभियान पर निकलने से पहले वे एक और ऐतिहासिक उपलब्धि के बेहद करीब थे। केवल चो ओयू बाकी था, जिसके बाद वे बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के सभी 14 आठ-हजार मीटर चोटियों को दो बार फतह करने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति बन जाते।
रवाना होने से पहले उन्होंने लिखा था—
“ब्रॉड पीक, मैं तुमसे कुछ नहीं मांगता… बस सुरक्षित ऊपर जाने और सुरक्षित वापस लौट आने की दुआ करता हूं।”
यह एक छोटी-सी प्रार्थना थी।
लेकिन किस्मत ने उसे पूरा नहीं होने दिया।
उनका सपना अधूरा रह गया।
फिर भी उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई रिकॉर्ड नहीं थी।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी पूरी दुनिया की नजरों में नेपाल का सम्मान बढ़ाना।
उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को सिखाया कि बड़े सपने देखो, ऊंचा सोचो और यह मानो कि ‘असंभव’ सिर्फ शुरुआत है।
पहाड़ हमेशा खड़े रहेंगे।
रिकॉर्ड एक दिन टूट जाएंगे।
लेकिन निम्सदाई जैसे लोग एक पीढ़ी में सिर्फ एक बार जन्म लेते हैं।
उनके कदमों के निशान हमेशा दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर रहेंगे और उनकी विरासत हर उस पर्वतारोही को प्रेरित करती रहेगी जो असंभव से आगे सपने देखने का साहस रखता है।

